जी रहे थे अब तक हम सपनो की दुनिया में,
कि हकीकत का सामना कभी हम न कर सके।
ख्यालों ही ख्यालों में अपने जीवन को चलाते रहे,
कि जब हम गिरे तो पत्थरों की चोट खाते रहे।
फिर भी अपनी भूल को हम न मान सके,
जाना जब हमने अपने आप को, सारे भ्रम टुटते गए।
कि हमें अपने आप की पहचान होने लगी,
फिर हमारी सारी शिकायत खत्म होने लगी।
सच्ची राह और सच्ची मंजिल हमे तब मिलने लगी,
और फिर जीने लगे हम बडी शान से अपनी दुनिया में।
- डॉ. हीरा