जब गुरु संकल्प करते हैं, तब शिष्य में बदलाव आता है।
गुरु जब देते हैं, तब ही शिष्य कुछ पाता है।
गुरु जब सँवारते हैं, तब ही शिष्य बाहर निकलता है।
गुरु जब शिष्यों के कर्मों को लेते हैं, तब ही शिष्य के कर्म खतम होते हैं।
गुरु जब पुकारते हैं, तब ही शिष्य गुरु के पास आ सकता है।
गुरु जब अंतर मे उतरते हैं, तब ही शिष्य गुरु में एक होता है।
गुरु जब मंत्र देते हैं, तब ही वह शब्द शक्ति बनते हैं।
गुरु जब शिष्य अपनाता हैं, तब ही शिष्य भवसागर पार करता हैं।
गुरु जब खामोश होते हैं, तब ही शिष्य को सब कुछ देकर जाते हैं।
सब कुछ तो गुरु करते हैं, इसलिए ही तो गुरु ईश्वर से भी प्रथम होते हैं।
- डॉ. हीरा