तुझे याद करते करते हम ऐसे जहान में खो गए कि तुझे भी भूल गए।
न कुछ रहा, न तुम रहे, न हम रहे, बस कुछ भी न रहा।
कहाँ आ गए हम कि समय भी स्थिर रह गया।
न कुछ होश या न कुछ महसूस कर रहे थे हम, बस ऐसे खो गए।
न हमारी कोई पहचान रही, न तेरी कोई तड़प रही, बस सुकून ही रहा।
न कोई किनारा था, शांति और शांति ही थी।
न ये शरीर था, ना इस जान पे बोज था, ये जान का भी एहसास न था।
एक झील की आवाज़ थी, उसका मधुर गीत था, सुनहेरा सपना था।
सपना भी न लगा, हकीकत भी न था, जो था वही था।
समां हो ऐसा हमेशा, तेरे दर्शन का अनुभव हो ऐसा, यह कहानी ऐसे ही चलती रहे।
- डॉ. हीरा